(Vinod kushwaha) Born in Eastern UP, a microbiologist by profession and unseen storyteller by soul, I walk where science and literature walk the dusty roads together, weaving unseen stories.
Wednesday, May 13, 2026
कोर्ट को शोपिंग मॉल समझी औरतें.
बेटी के हाथ पकड़ झूठे केस कर के सालों से रात दिन कचहरियों में बिताने वाले लोग, २ ,२ हजार बेटी से भीख मंगवाने वाले मां, बाप, इतना मेहनत लड़की को स्कूल कॉलेजों में भेज के कराए होते तो बेटी किसी बड़े कंपनी, सरकारी दफ़्तर, किसी स्कूल में टीचर होती, और लाखों कमा रही होती, इजात के साथ, जितना वकीलों के साथ पसीने बहा रही है कोर्ट कचहरी पहुंची लड़कियों, उतने मेहनत में अच्छी लड़कियों अपने पैरों में खड़ी हो के कई लोगों का पेट पाल रही है। समानता महिलाओं को पुरुषों के बराबर करता है। पूरा भारत बेटी पड़ेगी बेटी बढ़ेगी, के आधार पर आगे बढ़ रहा है। सरकार और मां, बाप अपनी बेटी को आत्मनिर्भर बनने में लगे है। कुछ नीच मां बाप शदियों पुरानी प्रथा का समाज में गंध फैला रहे हैं ।लड़कियों से धंधा करा के अपने खर्च चलने में लगे हैं ।इतना ही बेटी का पैसा खाने का शौक है तो किसी कॉलेज से कोर्स करा दो इजाज़त के साथ दो रोटी कमा के खिलाएगी खुद भी खाएगी, न की वकीलों के साथ पसीने बहा के, सरेआम चरित्र का नाश कर के रोटी खाएगी। अच्छी घर की लड़कियां एक बार पुलिस स्टेशन कचहरियों में चली जाए तो उनको महीनों नींद नहीं आती बदनामी से, कुछ खानदान की लड़कियों नंगा नाच नाच रही कोर्ट के दहलीजों पे।
Sunday, May 10, 2026
निस्वार्थ
कॉलेज के दिनों मे रात 01:00 बजे तक आटा के लोईयों के साथ मां का इंतजार करते देखा इंतजार बस इसलिए था कि कही रोटियां बन जाए तो ठंडी न हो जाएं। सुबह 4 बजे उठने से पहले मां का 03:00 जगा हुआ पा के यही समझ आया। बच्चों का संघर्ष में कहीं जयादा होता है। उनके मां का संघर्ष जो निस्वार्थ चलता रहता है, बस इसी उम्मीद में की बेटा बड़ा हो जाए तो अच्छे से कमा खा सके। ताप्ती धूप में कड़ी मेहनत करते हुए इंसान को बस मां नहीं देख सकती। बाकि इस दुनिया में किसी को कुछ फर्क नहीं पड़ता,
Saturday, May 9, 2026
रिश्तों की दायरे सीमित है। इसे समाज तय करता हैं
कोर्ट पहुंची महिलाओं को, चंद कागज के टुकड़े ही मिले, उन्हीं नहीं मिल पाया, पति और सुसराल का प्यार, समाज में इज्ज़त, ना मिला मातृत्व, दुनिया की कोई भी कोर्ट कचहरियों में ये कानून नहीं है, जो दिला सके प्यार, समाज में इजाज़त, एहसास, अपनापन, लगाव, जोड़ सके रिश्तों को, कचहरीयां बनाई गई रिश्तों की कीमत तय करने के लिए, कचहरीयां ये तय नहीं करती किस्से कितना प्यार किया जाए या लगाव रखा जाए प्यार कानून में अभिव्यक्ति की आजादी है। रिश्ते सामाजिक बंधन है। इसे कानून नहीं जोड़ सकता। इसपर समाज का हक़ है, कोर्ट तक वही रिश्ते जाते है। जहां रिश्तों का सारे बंधन बिखर चुके होते है, कोर्ट के दहलीज पर पैर रखते, सारे रिश्ते दम तोड़ देते है, चाहे कोई भी रिश्ता हो। मां का,बाप का, भाई का, बहन का, पति पत्नी का, पति पत्नी के कोर्ट पहुंचने से पहले तलाक हो चुके होते है। कॉर्ट बस ये तय करती है कि इसकी कीमत क्या है।
Wednesday, May 6, 2026
निराश्रित लड़के
एग्जाम हाल के बाहर। काफी गाड़ियों खड़ी रहती थी, किसी के पापा, तो किसी के भाई, किसी के मां, किसी की पूरी फैमिली खड़ी रहती थी, लेने के लिए। उसी एग्जाम हाल से कुछ ऐसे लड़के निकलते थे, जिन्होंने पूरी रात रेलवे स्टेशन पर लेट के जाग के बिताई होती थी। वो भी निकलते थे उसी एग्जाम हाल से आधी नींद पूरी सपने लिऐ उन्हें कोई नहीं आया होता था लेने, ये वो लोग है जो कभी मायूस हुए ही नहीं, जो मिला जितना मिला जीने लगे एक उमर के बाद।
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छात्रों का संघर्ष बस छात्रों के कमरे की दीवार ही देख पाई है। कहा देख पाती है दुनिया दुनिया का सबसे बड़ा संघर्ष। दुनिया बस देखा है सफल और अस...
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कम पेड़ वाले जंगल जंगल नहीं रहे। कम पानी वाली नदियां नदियां नहीं रही। कुछ पेड़ अब पेड़ के श्रेणी से बाहर हो गए, 100 मीटर से कम पहाड़ अब पहाड...
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हर बार कुछ नया दिखता है। कुछ पुराने के साथ। बच्चे बड़े हो जाते है, बड़े के चेहरे पे झुरिया आ गई होती है। बूढ़े और झुक गए होते है, पौधा पेड़ ...