(Vinod kushwaha) Born in Eastern UP, a microbiologist by profession and unseen storyteller by soul, I walk where science and literature walk the dusty roads together, weaving unseen stories.
Wednesday, July 15, 2026
किताबें हमें बताती है कि हम पहले नहीं है।
हर हमारी सोची हुए बाते हमारी इमैजिनेशन किसी न किसी किताब के पन्नों पे लिख दी गई है। जब हम किताबों को पढ़ते है। तब हम जन पाते है। की हम जो सोचते है। जो हमारी कहानी है। ये बहुत पहले हो चुकी है। किताबें हमें बताती है। की हम जैसे बहुत आए है। और चले गए है। किताबों को पढ़ने पे पता चलता है। हमारी जिंदगी में होने वाली उथल पुथल। केवल हम ही तक सीमित नहीं है। इससे कई लोगो गुजर चुके है। वास्तव में किताबें ही हमे बताती है। की हमारी औकात क्या है। इसी लिए ज्यादा ज्ञान अर्जित किये हुवे लोग शांत हो जाते है। और चंद कागज के टुकड़े पे कुछ प्रिंट आउट ले के कुछ लोग डिग्री का शोर मचाते है। ज्ञान किसी एक कागज के प्रिंट का परिणाम नहीं है। ज्ञान लाखों करोड़ों कागज पे लिखे अक्षरों को जानने का परिणाम है। बदलते परिवेश में समाज और संस्थान इस अस्तर तक पहुँच गए है। की एक पेज की प्रिंट आउट से ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट करा दे रहे है। भले ही वो इंसान किसी किताब का पूरा पेज अपने जीवन में कभी नहीं पढ़ा हो। ज्ञान पैसों से नहीं खरीदा जा सकता। उसे ग्रहण करना पड़ता है। शिक्षा का अस्तर इतना नहीं गिर जाना चाहिए कि ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट किए युवा विषय का नाम न बता पाए। जिस तरह किसी रिसर्च को करने से पहले उस पे की गई पहले की रिसर्च पढ़ने पड़ते है। उसी तरह अगर समाज में बदलाव लाने है। तो पहले जानना होगा समाज बना कैसे है। समाज हैं क्या। समाज कैसे काम करता है। और ये सब जानने के लिए किताबों को पढ़ना पड़ेगा। किताबें पढ़ते पढ़ते समाज को जानने की कोशिश में कई बार हम खुद को किसी पन्ने पे पा लेते है। और समाज के साथ हम भी सुधार जाते है।
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