A Few Things From My Diary
(Vinod kushwaha) Born in Eastern UP, a microbiologist by profession and unseen storyteller by soul, I walk where science and literature walk the dusty roads together, weaving unseen stories.
Wednesday, May 6, 2026
निराश्रित लड़के
एग्जाम हाल के बाहर। काफी गाड़ियों खड़ी रहती थी, किसी के पापा, तो किसी के भाई, किसी के मां, किसी की पूरी फैमिली खड़ी रहती थी, लेने के लिए। उसी एग्जाम हाल से कुछ ऐसे लड़के निकलते थे, जिन्होंने पूरी रात रेलवे स्टेशन पर लेट के जाग के बिताई होती थी। वो भी निकलते थे उसी एग्जाम हाल से आधी नींद पूरी सपने लिऐ उन्हें कोई नहीं आया होता था लेने, ये वो लोग है जो कभी मायूस हुए ही नहीं, जो मिला जितना मिला जीने लगे एक उमर के बाद।
Tuesday, March 31, 2026
भूले हुए लोग
भूले हुए लोग जब वापस आते है। तो लोग ही वापस नहीं आते वो पुराने दिन भी वापस लाते है, इंसान के चेहरे कई सारे यादों के कब्रिस्तान भी होते है, जिन्हें देखते ही कई सारे दफन स्मृति सामने आ जाती है।
Sunday, February 22, 2026
उन सारे जगहों पे जाना चाहिए जहां अतीत दफ़न हैं
पुराने जगहों पे लौट के अक्सर जाना चाहिए। हर उस जगह पे जहाँ से हम अपनी जिंदगी की नई शुरुआत की हो। क्यों कि हर नई शुरूआत पुरानी चीजों को दफन कर देती है, हम जब वापस उन जगहों पे जाते है जहां से हर नई जिंदगी की शुरुआत हुईं हो। हम अपने कई सारे अतीत को पाते है, ऐसे अतीत और अनुभव जिसे आप जा के ही समझ सकते हो। जैसे आप पुरानी माँ, पापा की बॉक्स, अटैची, अलमारी, खोलते हो, पुरानी कॉपी किताब खोलते हो, अपनी स्कूल की गेट से गुजरते हो, पुराने क्लासमेट को देखते हो, बहुत ऐसी जगह है जहां दफन है एक याद, एक गम, एक खुशी, एक कहानी, और न जाने क्या क्या। दफन है हर उस दौर की कहानी जो अब अतीत हो चुकी है।
Thursday, February 5, 2026
ये चलती साँसें अधूरे सपने ढोती हैं,
देखो उन्हें, जो अचानक चले जाते हैं—
किसी हादसे में, एक ही पल में।
उनके शांत शरीर के पास
मर्सिडीज़ की चाबियाँ,
महंगी घड़ियाँ, ब्रांडेड सामान
ऐसे बिखरे रहते हैं जैसे ट्रॉफियाँ।
पर कुछ भी उनके साथ नहीं जाता।
न गाड़ी, न पैसा, न नाम।
ये चलती साँसें अधूरे सपने ढोती हैं,
पर कोई नहीं जानता कब थम जाएँगी।
न उम्र का अंदाज़ा, न उस आख़िरी पल का—
क्योंकि यह दौर एक सेकंड के बदलाव का है।
तुम्हारी सीट, तुम्हारा ओहदा, तुम्हारे लोग, तुम्हारे सपने,
तुम्हारी सफलता, तुम्हारा काम—
सब यहीं रह जाएगा, धूल में बने पैरों के निशानों की तरह।
आख़िर में बस ख़ामोशी ही याद रखेगी
कि दुनिया कभी तुम्हें किस नाम से जानती थी।
Deepest thoughts in early morning.
Date - 05/02/2026
Monday, January 26, 2026
पूर्वी यूपी
पूर्वांचल पर बनी वेबसरीज हो या उपन्यास हो जब भी लिखी गई हैं। अच्छी लोकप्रियता हासिल की हैं।
कुछ ऐसे उपन्यास, या वेबसरीज है जिनको पढ़ते या देखते समय लगता है। हम खुद उस किरायेदार को जी रहे है।
नोबेल ! यू पी 65" और बनारस टॉकीज" जो कि BHU और उसके आस पास होते छात्र के जीवन और उनके संघर्षों को दर्शाता है। वहीं अक्टूबर जंक्शन जो कि दो ऐसे लोगों की कहानी है जो बनारस में मिलते है।
ये तीनों उपन्यास की कहानी बनारस गलियों के ईर्द गिर्द घूमती है।, वही "गुनाहों का देवता" जो इलाहाबाद शहर की कहानी बया करता है।
"गोदान" जो पूर्वांचल के गांव को बहुत गहरी से बया करता है। और आज भी पढ़ते वक्त लगता ही नहीं है कि ये 1940 से पहले लिखी गई है ! Webseries बात करे तो हाल ही में आई, पंचायत। मिर्जापुर और गर्मी है, गर्मी वेबसरीज जो यूनिवर्सिटी ऑफ इलाहाबाद पे आधारित है। जो खास कर पूर्वी यूपी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में होने वाली छात्र पॉलिटिक्स को अच्छे से दिखाता हैं।
Sunday, December 21, 2025
पैमाने के आधार पर दायरे की नई परिभाषा
कम पेड़ वाले जंगल जंगल नहीं रहे। कम पानी वाली नदियां नदियां नहीं रही। कुछ पेड़ अब पेड़ के श्रेणी से बाहर हो गए, 100 मीटर से कम पहाड़ अब पहाड़ के दायरे से बाहर रहेंगे, छोटे किसान किसान के दायरे से बाहर रहे, इंसान की जरूरतों के हिसाब से हर दायरे की नई परिभाषा इंसानों द्वारा लिखी जाती रही है, ऐसी परिभाषाएं लिखी जाती रही तो, एक दिन देश दुनिया पे मजबूत पकड़ रखने वाले लोग गरीब को भी किसी दिन इंसान के दायरे से बाहर कर देंगे, फिर Survival of the fittest, intraspecific हो जाएगा, मनुष्य भी किसी दिन threatened species की तरह संघर्ष करेगा, अभी homo sapiens species इतनी मजबूत हो गई है कि। अब और कोई प्रजाति इनका मुकाबला नहीं कर सकती, हकीकत तो ये है कि इन प्रजाति के बीच भी बहुत पहले से ही intraspecific competition शुरू हो गया है, इसका परिणाम स्वरूप आने वाले भविष्य में ऐसा होगा कि। इंसानों में से ही कुछ कमजोर वर्ग इंसान को इंसान के श्रेणी से बाहर हो कर दिया जायेगा। पृथ्वी पर घनत्व, नंबर, मास, बल, ऊंचाई, ये तय करते है कि कौन विलुप्त होगा और कौन जिंदा रहेगा,
Vinod kushwaha
Tuesday, October 21, 2025
हर बार कुछ भी वैसा नहीं होता।
हर बार कुछ नया दिखता है। कुछ पुराने के साथ। बच्चे बड़े हो जाते है, बड़े के चेहरे पे झुरिया आ गई होती है। बूढ़े और झुक गए होते है, पौधा पेड़ बन गया होता है, छोटे बरगद, पीपल, नीम, सब बड़े वृक्ष में तब्दील हो गए होते है, कुछ पुराने पेड़ कट चुके होते है। समय के साथ सब कुछ बदल चुका होता है। हर बार कुछ पुराने लोग पुराने वृक्ष खत्म हो चुके होते है, समय के समृद्धियों में ये दफन होते लोग जो हर बार नहीं मिलते जो पिछले बार मिले थे। एहसास दिला जाते है। अपने खुद के चेहरे की रूप, ढलते उमर की एहसास, और जीवन का अंतिम लक्ष्य, जो व्यस्त जीवन में ठीक से देखने का मौका तक नहीं मिलता, गांव से जाने और हमेशा के लिए वापस आने तक, बहुत कुछ बदल चुका होता है, जैसे चमकते चेहर और सिल्की बॉल, झुरिया, पक्के बालों और झूलती मांशपेशियों में तब्दील हो गई होती है। कितनी निराधार है भविष्य की कल्पनाएं।
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