Tuesday, July 21, 2026

लोकतंत्र या लाठीतंत्र?

सर फोड़ती लाठिया ये साबित करती हैं। की सता में बैठा शासक कितना क्रूर और तानाशाह हैं।

वो सब मरे जाएंगे जो चुप है।

बेरोजगार, किसान, छात्र, यही लड़ सकते है। हर इंसान के हिस्से की अन्याय की लड़ाई। ये कामकाजी नौकरी पेशे लोग अन्याय के खिलाप कभी नहीं बोलेंगे। अंग्रेजी हुकूमत में भी जिनको काम मिल गया था। वो कभी नहीं बोले अंग्रेजों के खिलाफ। ७०% इंसान को अन्याय तभी दिखता है। जब तक उसके साथ नहीं होता। ३०% लोग क्रांतिकारी होते है। उन्हें अपना पराया नहीं बस अन्याय दिखता है। वो हर अनन्य की चिंगारी पे आवाज बुलन्द करते हैं। ये ३०% लोग सदियों से सदियों तक पैदा होते रहेंगे, और सदियों तक याद किए जाएंगे। हर हिस्से की लड़ाई लड़ने के लिए। 
Democracy cannot function under dictatorship,  

Wednesday, July 15, 2026

किताबें हमें बताती है कि हम पहले नहीं है।

हर हमारी सोची हुए बाते हमारी इमैजिनेशन किसी न किसी किताब के पन्नों पे लिख दी गई है। जब हम किताबों को पढ़ते है। तब हम जन पाते है। की हम जो सोचते है। जो हमारी कहानी है। ये बहुत पहले हो चुकी है। किताबें हमें बताती है। की हम जैसे बहुत आए है। और चले गए है। किताबों को पढ़ने पे पता चलता है। हमारी जिंदगी में होने वाली उथल पुथल। केवल हम ही तक सीमित नहीं है। इससे कई लोगो गुजर चुके है। वास्तव में किताबें ही हमे बताती है। की हमारी औकात क्या है। इसी लिए ज्यादा ज्ञान अर्जित किये हुवे लोग शांत हो जाते है। और चंद कागज के टुकड़े पे कुछ प्रिंट आउट ले के कुछ लोग डिग्री का शोर मचाते है। ज्ञान किसी एक कागज के प्रिंट का परिणाम नहीं है। ज्ञान लाखों करोड़ों कागज पे लिखे अक्षरों को जानने का परिणाम है। बदलते परिवेश में समाज और संस्थान इस अस्तर तक पहुँच गए है। की एक पेज की प्रिंट आउट से ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट करा दे रहे है। भले ही वो इंसान किसी किताब का पूरा पेज अपने जीवन में कभी नहीं पढ़ा हो। ज्ञान पैसों से नहीं खरीदा जा सकता। उसे ग्रहण करना पड़ता है। शिक्षा का अस्तर इतना नहीं गिर जाना चाहिए कि ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट किए युवा विषय का नाम न बता पाए। जिस तरह किसी रिसर्च को करने से पहले उस पे की गई पहले की रिसर्च पढ़ने पड़ते है। उसी तरह अगर समाज में बदलाव लाने है। तो पहले जानना होगा समाज बना कैसे है। समाज हैं क्या। समाज कैसे काम करता है। और ये सब जानने के लिए किताबों को पढ़ना पड़ेगा। किताबें पढ़ते पढ़ते समाज को जानने की कोशिश में कई बार हम खुद को किसी पन्ने पे पा लेते है। और समाज के साथ हम भी सुधार जाते है। 

Sunday, May 10, 2026

निस्वार्थ

कॉलेज के दिनों मे रात 01:00 बजे तक आटा के लोईयों के साथ मां का इंतजार करते देखा इंतजार बस इसलिए था कि कही रोटियां बन जाए तो ठंडी न हो जाएं। सुबह 4 बजे उठने से पहले मां का 03:00 जगा हुआ पा के यही समझ आया। बच्चों का संघर्ष में कहीं जयादा होता है। उनके मां का संघर्ष जो निस्वार्थ चलता रहता है, बस इसी उम्मीद में की बेटा बड़ा हो जाए तो अच्छे से कमा खा सके। ताप्ती धूप में कड़ी मेहनत करते हुए इंसान को बस मां नहीं देख सकती। बाकि इस दुनिया में किसी को कुछ फर्क नहीं पड़ता, 

Wednesday, May 6, 2026

निराश्रित लड़के

एग्जाम हाल के बाहर। काफी गाड़ियों खड़ी रहती थी, किसी के पापा, तो किसी के भाई, किसी के मां, किसी की पूरी फैमिली खड़ी रहती थी, लेने के लिए। उसी एग्जाम हाल से कुछ ऐसे लड़के निकलते थे, जिन्होंने पूरी रात रेलवे स्टेशन पर लेट के जाग के बिताई होती थी। वो भी निकलते थे उसी एग्जाम हाल से आधी नींद पूरी सपने लिऐ उन्हें कोई नहीं आया होता था लेने, ये वो लोग है जो कभी मायूस हुए ही नहीं, जो मिला जितना मिला जीने लगे एक उमर के बाद।

Tuesday, March 31, 2026

भूले हुए लोग

भूले हुए लोग जब वापस आते है। तो लोग ही वापस नहीं आते वो पुराने दिन भी वापस लाते है, इंसान के चेहरे कई सारे यादों के कब्रिस्तान भी होते है, जिन्हें देखते ही कई सारे दफन स्मृति सामने आ जाती है।

Sunday, February 22, 2026

उन सारे जगहों पे जाना चाहिए जहां अतीत दफ़न हैं

पुराने जगहों पे लौट के अक्सर जाना चाहिए। हर उस जगह पे जहाँ से हम अपनी जिंदगी की नई शुरुआत की हो। क्यों कि हर नई शुरूआत पुरानी चीजों को दफन कर देती है, हम जब वापस उन जगहों पे जाते है जहां से हर नई जिंदगी की शुरुआत हुईं हो। हम अपने कई सारे अतीत को पाते है, ऐसे अतीत और अनुभव जिसे आप जा के ही समझ सकते हो। जैसे आप पुरानी माँ, पापा की बॉक्स, अटैची, अलमारी, खोलते हो, पुरानी कॉपी किताब खोलते हो, अपनी स्कूल की गेट से गुजरते हो, पुराने क्लासमेट को देखते हो, बहुत ऐसी जगह है जहां दफन है एक याद, एक गम, एक खुशी, एक कहानी, और न जाने क्या क्या। दफन है हर उस दौर की कहानी जो अब अतीत हो चुकी है। 

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