A Few Things From My Diary
(Vinod kushwaha) Born in Eastern UP, a microbiologist by profession and unseen storyteller by soul, I walk where science and literature walk the dusty roads together, weaving unseen stories.
Sunday, February 22, 2026
उन सारे जगहों पे जाना चाहिए जहां अतीत दफ़न हैं
पुराने जगहों पे लौट के अक्सर जाना चाहिए। हर उस जगह पे जहाँ से हम अपनी जिंदगी की नई शुरुआत की हो। क्यों कि हर नई शुरूआत पुरानी चीजों को दफन कर देती है, हम जब वापस उन जगहों पे जाते है जहां से हर नई जिंदगी की शुरुआत हुईं हो। हम अपने कई सारे अतीत को पाते है, ऐसे अतीत और अनुभव जिसे आप जा के ही समझ सकते हो। जैसे आप पुरानी माँ, पापा की बॉक्स, अटैची, अलमारी, खोलते हो, पुरानी कॉपी किताब खोलते हो, अपनी स्कूल की गेट से गुजरते हो, पुराने क्लासमेट को देखते हो, बहुत ऐसी जगह है जहां दफन है एक याद, एक गम, एक खुशी, एक कहानी, और न जाने क्या क्या। दफन है हर उस दौर की कहानी जो अब अतीत हो चुकी है।
Thursday, February 5, 2026
ये चलती साँसें अधूरे सपने ढोती हैं,
देखो उन्हें, जो अचानक चले जाते हैं—
किसी हादसे में, एक ही पल में।
उनके शांत शरीर के पास
मर्सिडीज़ की चाबियाँ,
महंगी घड़ियाँ, ब्रांडेड सामान
ऐसे बिखरे रहते हैं जैसे ट्रॉफियाँ।
पर कुछ भी उनके साथ नहीं जाता।
न गाड़ी, न पैसा, न नाम।
ये चलती साँसें अधूरे सपने ढोती हैं,
पर कोई नहीं जानता कब थम जाएँगी।
न उम्र का अंदाज़ा, न उस आख़िरी पल का—
क्योंकि यह दौर एक सेकंड के बदलाव का है।
तुम्हारी सीट, तुम्हारा ओहदा, तुम्हारे लोग, तुम्हारे सपने,
तुम्हारी सफलता, तुम्हारा काम—
सब यहीं रह जाएगा, धूल में बने पैरों के निशानों की तरह।
आख़िर में बस ख़ामोशी ही याद रखेगी
कि दुनिया कभी तुम्हें किस नाम से जानती थी।
Deepest thoughts in early morning.
Date - 05/02/2026
Monday, January 26, 2026
पूर्वी यूपी
पूर्वांचल पर बनी वेबसरीज हो या उपन्यास हो जब भी लिखी गई हैं। अच्छी लोकप्रियता हासिल की हैं।
कुछ ऐसे उपन्यास, या वेबसरीज है जिनको पढ़ते या देखते समय लगता है। हम खुद उस किरायेदार को जी रहे है।
नोबेल ! यू पी 65" और बनारस टॉकीज" जो कि BHU और उसके आस पास होते छात्र के जीवन और उनके संघर्षों को दर्शाता है। वहीं अक्टूबर जंक्शन जो कि दो ऐसे लोगों की कहानी है जो बनारस में मिलते है।
ये तीनों उपन्यास की कहानी बनारस गलियों के ईर्द गिर्द घूमती है।, वही "गुनाहों का देवता" जो इलाहाबाद शहर की कहानी बया करता है।
"गोदान" जो पूर्वांचल के गांव को बहुत गहरी से बया करता है। और आज भी पढ़ते वक्त लगता ही नहीं है कि ये 1940 से पहले लिखी गई है ! Webseries बात करे तो हाल ही में आई, पंचायत। मिर्जापुर और गर्मी है, गर्मी वेबसरीज जो यूनिवर्सिटी ऑफ इलाहाबाद पे आधारित है। जो खास कर पूर्वी यूपी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में होने वाली छात्र पॉलिटिक्स को अच्छे से दिखाता हैं।
Sunday, December 21, 2025
पैमाने के आधार पर दायरे की नई परिभाषा
कम पेड़ वाले जंगल जंगल नहीं रहे। कम पानी वाली नदियां नदियां नहीं रही। कुछ पेड़ अब पेड़ के श्रेणी से बाहर हो गए, 100 मीटर से कम पहाड़ अब पहाड़ के दायरे से बाहर रहेंगे, छोटे किसान किसान के दायरे से बाहर रहे, इंसान की जरूरतों के हिसाब से हर दायरे की नई परिभाषा इंसानों द्वारा लिखी जाती रही है, ऐसी परिभाषाएं लिखी जाती रही तो, एक दिन देश दुनिया पे मजबूत पकड़ रखने वाले लोग गरीब को भी किसी दिन इंसान के दायरे से बाहर कर देंगे, फिर Survival of the fittest, intraspecific हो जाएगा, मनुष्य भी किसी दिन threatened species की तरह संघर्ष करेगा, अभी homo sapiens species इतनी मजबूत हो गई है कि। अब और कोई प्रजाति इनका मुकाबला नहीं कर सकती, हकीकत तो ये है कि इन प्रजाति के बीच भी बहुत पहले से ही intraspecific competition शुरू हो गया है, इसका परिणाम स्वरूप आने वाले भविष्य में ऐसा होगा कि। इंसानों में से ही कुछ कमजोर वर्ग इंसान को इंसान के श्रेणी से बाहर हो कर दिया जायेगा। पृथ्वी पर घनत्व, नंबर, मास, बल, ऊंचाई, ये तय करते है कि कौन विलुप्त होगा और कौन जिंदा रहेगा,
Vinod kushwaha
Tuesday, October 21, 2025
हर बार कुछ भी वैसा नहीं होता।
हर बार कुछ नया दिखता है। कुछ पुराने के साथ। बच्चे बड़े हो जाते है, बड़े के चेहरे पे झुरिया आ गई होती है। बूढ़े और झुक गए होते है, पौधा पेड़ बन गया होता है, छोटे बरगद, पीपल, नीम, सब बड़े वृक्ष में तब्दील हो गए होते है, कुछ पुराने पेड़ कट चुके होते है। समय के साथ सब कुछ बदल चुका होता है। हर बार कुछ पुराने लोग पुराने वृक्ष खत्म हो चुके होते है, समय के समृद्धियों में ये दफन होते लोग जो हर बार नहीं मिलते जो पिछले बार मिले थे। एहसास दिला जाते है। अपने खुद के चेहरे की रूप, ढलते उमर की एहसास, और जीवन का अंतिम लक्ष्य, जो व्यस्त जीवन में ठीक से देखने का मौका तक नहीं मिलता, गांव से जाने और हमेशा के लिए वापस आने तक, बहुत कुछ बदल चुका होता है, जैसे चमकते चेहर और सिल्की बॉल, झुरिया, पक्के बालों और झूलती मांशपेशियों में तब्दील हो गई होती है। कितनी निराधार है भविष्य की कल्पनाएं।
Sunday, July 6, 2025
आदमी बिन पैरों वाला
कभी कभी कुछ चीजें आंखों के सामने आती है तो गहरा अनुभव दे जाती है। यू एक शहर से गुजर रहा था। तो मेरी नजर एक आदमी पे पड़ी। पैरों में लंबी पट्टी लपेटा हुआ था। चलने में अस्मर्थ था। हाथों के बल चल रहा था, दुबला पतला सा इंसान। ऐसे बहुत लोग नजर आ जाएंगे आपको जो दिखते हुए किसी को दिखाई नहीं देते। न समाज के ठेकेदारों को न सरकारों को, मै सोचा इस व्यक्ति के पास धैर्य कितना होगा। जो जी रहा है। और उम्मीद किस बात की जीने की या कुछ करने की। और होगा कौन इसके जीवन में। जो सड़ गल गए पैर पे इस हालत में रोड पे रेंग रहा है। ये आदमी कौन होगा। चलते जा रहा था। देखा एक दुकान वाले ने तरस खा के थोड़ी से चावल और पानी दे दिए। खाने को शायद ऐसे ही जी रहा होगा। ये आदमी। आए दिन आत्महत्या की खबर आती रहती है। उनके पास इससे खराब स्थिति तो होगी नहीं। फिर भी जीवन से चले जाते है लोग उमर से पहले। शायद ये इंसान इस लिए जी रहा होगा की ये ऐसी ही जीवन जीते देखा है औरों को। कही न कही ये भिखारी ही रहा होगा। वर्ना किस के पास हिम्मत होती। ऐसी जीवन जीने की। जीवन कभी भी कोई रूप ले सकती है। चाहे आप कितने भी अमीर क्यों नहीं हो गए हो वापस चंद मिनटों में आ जाओगे। और शायद आप जी नहीं पाओगे वापस आने के बाद। सीमित सुख सुविधाओं में वो लोग जो बहुत अमीर है। वो नहीं जी पाते। वो बहुत कुछ बचा होने के बाद भी महसूस करते हैं तंगी। और तंगी से आत्महत्या कर लेते है। जिनके पास बंगला गाड़ी कुछ पैसे होते है। लेकिन बस पहले जैसे नहीं रह जाते। वो बस इतने से निराश हो के खुद को खत्म कर लेते है। जीने के लिए चाहिए क्या । कुछ पैसे जो जरूरतें पूरा हो जाएं। असल में आत्महत्या एक बीमारी है। जिसको अपने चपेट में ले लेती है। वो चला जाता ऐसा मुझे लगता हैं। पैसों से आनंद मिलता है। ऐसा है क्या ? ,सरकारी स्कूलों से पढ़ कर , सरकारी बसों से यात्रा कर के। जनरल बोगी में यात्रा करके। पैदल कुछ दूरी चल के। गांव में रह के खेती कर के, साइकिल से चल के। किसी छोटी सी गुमटी में चाय पी के। पकौड़े समोसा खा के देखा हैं। इसमें कम आनंद है क्या। इसका भी अपना सुखद आनंद है। जितने जमीन से जुड़ेगे रहेंगे आप । यकीन मानिए आप जीवन में एक मजबूत योद्धा बने रहेंगे और आपकी हालत कभी ऐसी नहीं हो सकती कि आप दुनिया उमर से पहले छोड़ने का प्लान बना ले। जितने जमीन से जुड़े रहेंगे। उतना ही जीने का एक्सपीरियंस होगा। आगे बढ़ना अच्छी बात है । लेकिन इतना आगे नहीं कि वापस आओ तो जी नहीं पाओ। उसी जगह पे जहां जीवन जी चुके हो। सरल जीवन सहज बनती है। सहजता प्राकृतिक है। प्राकृतिक बोध करती है। की जीवन क्या है। असल में हम क्या है। प्राकृतिक को वास्तविकता पता है। हर जीव के जीवन का।
-Lines from a Novel I'm writing- ongoing
Sunday, June 1, 2025
गोदान: जहां हर किरदार किसी अपने जैसा लगता है"
गोदान" जो पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांव को बहुत गहराई से बया करता है। और आज भी पढ़ते वक्त लगता ही नहीं है। कि ये 1940 से पहले लिखी गई है। बहुत लोगों ने पढ़ा है आज भी सुनता हु, हर सिविल सेवा में जाने वाले इसे जरूर पढ़ते है। और बताया जाता है, की यह नोवेल काल्पनिक है, हमे लगा पढ़ते वक्त की हर वो बात काल्पनिक है। जब तक हम उसे देखे नहीं है। 1936 नहीं है। फिर भी अगर आप गांव में देखोगे तो आज भी ऐसे परिवार है जो। "होरी, रायसाहब, गोबर, पंडित दातादीन, धनिया, मालती, झुनिया, गोविंदी. मिल जाएंगे, जमीदार तो नहीं देखा है। लेकिन इसके अलावा हर पात्र को मैने देखा है; गांव में जो आज भी इसी स्थिति में वैसे ही है। जैसे इस उपन्यास में लिखा गया हैं। होरी जैसे लोगो को देख है, जो होरी से भी दयनीय अवस्था में जीवन यापन करते है, गोदान से भी मार्मिक कहानियां आज भी समाज में है। लेकिन वो तबका समाज का ऐसा है। जहां तक किसी की नजर ही नहीं जाती। न कोई बात करता हैं उनकी, एक बात तो है! होरी जैसे लोगो के लड़के गोबर जैसे ही होते है, देखा है हमने बहुत सारे होरी के लड़के गोबर जैसा बनते हुए। तभी तो पढ़ते वक्त लगता है। अब न ही पड़ा जाए तो सही है। जब लेखक सामने देखी समाज के घटनाओं को लिखता है। न तो ऐसी ही कहानियों निकल के आती है। जो शायद आज के दौर के CBSC वाले लेखक कभी लिख ही नहीं सकते। न ऐसे उपन्यास दोबारा लिखा जाएगा।
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