जैसे सर्दी का एहसास होते ही सरीसृप धीरे-धीरे
अपने घोंसलों, अपने बिलों में लौट जाते हैं,
कुछ महीनों के लिए, एक लंबी नींद के लिए;
जैसे अक्टूबर आते ही हवा में कुहासे का पहला संकेत उतर आता है,
जैसे लोग धीरे-धीरे अपने वस्त्र बदलने लगते हैं,
वैसे ही कुछ यादें भी लौट आती हैं।
कुछ यादों के चले जाने के बाद,
कुछ नई यादें वापस आ जाती हैं।
कुछ अतीत मौसम बनकर लौटते हैं —
मौसम के साथ आते हैं, और मौसम के साथ ही चले भी जाते हैं।
और कुछ यादें... मौसम से ही चिपक जाती हैं।
वो हर साल आती हैं, उसी कुहासे के साथ, उसी सर्द हवा के साथ,
और फिर उसी तरह चुपचाप लौट भी जाती हैं।
तब समझ आता है —
दुःख भी कई बार स्थायी नहीं होता,
वो भी सीजनल हो जाता है।
© Author: Vinod Kumar Kushwaha