A Few Things From My Diary
(Vinod kushwaha) Born in Eastern UP, a microbiologist by profession and unseen storyteller by soul, I walk where science and literature walk the dusty roads together, weaving unseen stories.
Sunday, May 10, 2026
निस्वार्थ
कॉलेज के दिनों मे रात 01:00 बजे तक आटा के लोईयों के साथ मां का इंतजार करते देखा इंतजार बस इसलिए था कि कही रोटियां बन जाए तो ठंडी न हो जाएं। सुबह 4 बजे उठने से पहले मां का 03:00 जगा हुआ पा के यही समझ आया। बच्चों का संघर्ष में कहीं जयादा होता है। उनके मां का संघर्ष जो निस्वार्थ चलता रहता है, बस इसी उम्मीद में की बेटा बड़ा हो जाए तो अच्छे से कमा खा सके। ताप्ती धूप में कड़ी मेहनत करते हुए इंसान को बस मां नहीं देख सकती। बाकि इस दुनिया में किसी को कुछ फर्क नहीं पड़ता,
Saturday, May 9, 2026
रिश्तों की दायरे सीमित है। इसे समाज तय करता हैं
कोर्ट पहुंची महिलाओं को, चंद कागज के टुकड़े ही मिले, उन्हीं नहीं मिल पाया, पति और सुसराल का प्यार, समाज में इज्ज़त, ना मिला मातृत्व, दुनिया की कोई भी कोर्ट कचहरियों में ये कानून नहीं है, जो दिला सके प्यार, समाज में इजाज़त, एहसास, अपनापन, लगाव, जोड़ सके रिश्तों को, कचहरीयां बनाई गई रिश्तों की कीमत तय करने के लिए, कचहरीयां ये तय नहीं करती किस्से कितना प्यार किया जाए या लगाव रखा जाए प्यार कानून में अभिव्यक्ति की आजादी है। रिश्ते सामाजिक बंधन है। इसे कानून नहीं जोड़ सकता। इसपर समाज का हक़ है, कोर्ट तक वही रिश्ते जाते है। जहां रिश्तों का सारे बंधन बिखर चुके होते है, कोर्ट के दहलीज पर पैर रखते, सारे रिश्ते दम तोड़ देते है, चाहे कोई भी रिश्ता हो। मां का,बाप का, भाई का, बहन का, पति पत्नी का, पति पत्नी के कोर्ट पहुंचने से पहले तलाक हो चुके होते है। कॉर्ट बस ये तय करती है कि इसकी कीमत क्या है।
Wednesday, May 6, 2026
निराश्रित लड़के
एग्जाम हाल के बाहर। काफी गाड़ियों खड़ी रहती थी, किसी के पापा, तो किसी के भाई, किसी के मां, किसी की पूरी फैमिली खड़ी रहती थी, लेने के लिए। उसी एग्जाम हाल से कुछ ऐसे लड़के निकलते थे, जिन्होंने पूरी रात रेलवे स्टेशन पर लेट के जाग के बिताई होती थी। वो भी निकलते थे उसी एग्जाम हाल से आधी नींद पूरी सपने लिऐ उन्हें कोई नहीं आया होता था लेने, ये वो लोग है जो कभी मायूस हुए ही नहीं, जो मिला जितना मिला जीने लगे एक उमर के बाद।
Tuesday, March 31, 2026
भूले हुए लोग
भूले हुए लोग जब वापस आते है। तो लोग ही वापस नहीं आते वो पुराने दिन भी वापस लाते है, इंसान के चेहरे कई सारे यादों के कब्रिस्तान भी होते है, जिन्हें देखते ही कई सारे दफन स्मृति सामने आ जाती है।
Sunday, February 22, 2026
उन सारे जगहों पे जाना चाहिए जहां अतीत दफ़न हैं
पुराने जगहों पे लौट के अक्सर जाना चाहिए। हर उस जगह पे जहाँ से हम अपनी जिंदगी की नई शुरुआत की हो। क्यों कि हर नई शुरूआत पुरानी चीजों को दफन कर देती है, हम जब वापस उन जगहों पे जाते है जहां से हर नई जिंदगी की शुरुआत हुईं हो। हम अपने कई सारे अतीत को पाते है, ऐसे अतीत और अनुभव जिसे आप जा के ही समझ सकते हो। जैसे आप पुरानी माँ, पापा की बॉक्स, अटैची, अलमारी, खोलते हो, पुरानी कॉपी किताब खोलते हो, अपनी स्कूल की गेट से गुजरते हो, पुराने क्लासमेट को देखते हो, बहुत ऐसी जगह है जहां दफन है एक याद, एक गम, एक खुशी, एक कहानी, और न जाने क्या क्या। दफन है हर उस दौर की कहानी जो अब अतीत हो चुकी है।
Thursday, February 5, 2026
ये चलती साँसें अधूरे सपने ढोती हैं,
देखो उन्हें, जो अचानक चले जाते हैं—
किसी हादसे में, एक ही पल में।
उनके शांत शरीर के पास
मर्सिडीज़ की चाबियाँ,
महंगी घड़ियाँ, ब्रांडेड सामान
ऐसे बिखरे रहते हैं जैसे ट्रॉफियाँ।
पर कुछ भी उनके साथ नहीं जाता।
न गाड़ी, न पैसा, न नाम।
ये चलती साँसें अधूरे सपने ढोती हैं,
पर कोई नहीं जानता कब थम जाएँगी।
न उम्र का अंदाज़ा, न उस आख़िरी पल का—
क्योंकि यह दौर एक सेकंड के बदलाव का है।
तुम्हारी सीट, तुम्हारा ओहदा, तुम्हारे लोग, तुम्हारे सपने,
तुम्हारी सफलता, तुम्हारा काम—
सब यहीं रह जाएगा, धूल में बने पैरों के निशानों की तरह।
आख़िर में बस ख़ामोशी ही याद रखेगी
कि दुनिया कभी तुम्हें किस नाम से जानती थी।
Deepest thoughts in early morning.
Date - 05/02/2026
Monday, January 26, 2026
पूर्वी यूपी
पूर्वांचल पर बनी वेबसरीज हो या उपन्यास हो जब भी लिखी गई हैं। अच्छी लोकप्रियता हासिल की हैं।
कुछ ऐसे उपन्यास, या वेबसरीज है जिनको पढ़ते या देखते समय लगता है। हम खुद उस किरायेदार को जी रहे है।
नोबेल ! यू पी 65" और बनारस टॉकीज" जो कि BHU और उसके आस पास होते छात्र के जीवन और उनके संघर्षों को दर्शाता है। वहीं अक्टूबर जंक्शन जो कि दो ऐसे लोगों की कहानी है जो बनारस में मिलते है।
ये तीनों उपन्यास की कहानी बनारस गलियों के ईर्द गिर्द घूमती है।, वही "गुनाहों का देवता" जो इलाहाबाद शहर की कहानी बया करता है।
"गोदान" जो पूर्वांचल के गांव को बहुत गहरी से बया करता है। और आज भी पढ़ते वक्त लगता ही नहीं है कि ये 1940 से पहले लिखी गई है ! Webseries बात करे तो हाल ही में आई, पंचायत। मिर्जापुर और गर्मी है, गर्मी वेबसरीज जो यूनिवर्सिटी ऑफ इलाहाबाद पे आधारित है। जो खास कर पूर्वी यूपी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में होने वाली छात्र पॉलिटिक्स को अच्छे से दिखाता हैं।
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कम पेड़ वाले जंगल जंगल नहीं रहे। कम पानी वाली नदियां नदियां नहीं रही। कुछ पेड़ अब पेड़ के श्रेणी से बाहर हो गए, 100 मीटर से कम पहाड़ अब पहाड...
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हर बार कुछ नया दिखता है। कुछ पुराने के साथ। बच्चे बड़े हो जाते है, बड़े के चेहरे पे झुरिया आ गई होती है। बूढ़े और झुक गए होते है, पौधा पेड़ ...