Saturday, May 9, 2026

रिश्तों की दायरे सीमित है। इसे समाज तय करता हैं

कोर्ट पहुंची महिलाओं को, चंद कागज के टुकड़े ही मिले, उन्हीं नहीं मिल पाया, पति और सुसराल का प्यार, समाज में इज्ज़त, ना मिला मातृत्व, दुनिया की कोई भी कोर्ट कचहरियों में ये कानून नहीं है, जो दिला सके प्यार, समाज में इजाज़त, एहसास, अपनापन, लगाव, जोड़ सके रिश्तों को, कचहरीयां बनाई गई रिश्तों की कीमत तय करने के लिए, कचहरीयां ये तय नहीं करती किस्से कितना प्यार किया जाए या लगाव रखा जाए प्यार कानून में अभिव्यक्ति की आजादी है। रिश्ते सामाजिक बंधन है। इसे कानून नहीं जोड़ सकता। इसपर समाज का हक़ है, कोर्ट तक वही रिश्ते जाते है। जहां रिश्तों का सारे बंधन बिखर चुके होते है, कोर्ट के दहलीज पर पैर रखते, सारे रिश्ते दम तोड़ देते है, चाहे कोई भी रिश्ता हो। मां का,बाप का, भाई का, बहन का, पति पत्नी का, पति पत्नी के कोर्ट पहुंचने से पहले तलाक हो चुके होते है। कॉर्ट बस ये तय करती है कि इसकी कीमत क्या है। 

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