Tuesday, September 8, 2026

व्यवहारिक तौर पर प्रेम सबकुछ देखता है।

व्यवहारिक तौर पर प्रेम को वो लड़के
कभी प्रकट ही नहीं कर पाए,
जिनके शरीर पर सिले हुए,
सिकुड़े कपड़े और पैरों में टूटी चप्पल थी
क्लासरूम के अंदर,
गरीबी प्यार करने की इजाज़त नहीं देती,
गरीब प्यार करके बस मारा जाता है।

Vinod Kushwaha
A few things from My diary
:- Search on Google: Blogger Vinod Kushwaha

मौन और त्रासदी

झीलें, नदियाँ और समुद्र त्रासदी के बाद
फिर वैसे ही शांत होकर बहने लगते हैं,
जैसे कुछ हुआ ही न हो।

पहाड़ और नदियाँ सिखाती हैं— शांत रहना,
सुकून देना कमजोरी नहीं होता।

शांत सी दिखने वाली हर चीज़ के अंदर एक त्रासदी
छुपी होती है, जो वक़्त बे वक़्त कभी भी प्रलय में तब्दील हो जाती है।

— Vinod Kushwaha —
a few things from my diary.

दुनियां हादसों से ही बनी है

हादसे होना लाज़िम है। दुनियां हादसों से ही बनी है। कई हादसों ने इस दुनियां को अलग अलग रंग जगह पहचान दी है। हर हादसे के बाद दुनियां एक नई सीख के साथ जीना शुरू करती है। जो सबसे अलग होता है। हादसे कुछ मिटा के कुछ नया बनाने का एक प्रक्रिया है जो निरंतर चलती रहेगी। जैसे हम ब्लैक बोर्ड पर कुछ लिख के सीख के मिटा के कुछ नया लिखते है।

Author: Vinod Kushwaha
A Few Things From My Diary

Monday, September 7, 2026

अतीत लौटने की क्षमता रखता है

अतीत को कुछ पल के लिए भुलाया जा सकता है,
अतीत को त्यागा नहीं जा सकता, 
अतीत हमारे स्मृति का जटिल संग्रह है,
ये कोई आर्टिफीशियल डाटा स्टोरेज नहीं है।
अतः अतीत वर्तमान में आता रहेगा। अतीत जीवन का सबसे बड़ा हिस्सा है।
जिसे भुलाया नहीं जा सकता। भुलाना नामुमकिन है।

Saturday, September 5, 2026

दुनिया की सारी चीजें जो हम खरीदते है वो बस निशानियाँ हैं कि हम कभी जिंदा थे,

मलबे से निकलती लाल साढ़ियाँ, कुर्ते,
चप्पल, बैग्स, मोबाइल, पर्स,
ये वो सब चीज़ें सबूत हैं जिंदा रहने की।
दुनिया की सारी चीजें जो हम खरीदते हैं
वो बस निशानियाँ हैं कि हम कभी जिंदा थे,
जीवन जीने के लिए कुछ भी नहीं है जो जिंदा
रख सके, जीवन कभी भी किसी मलबे का ढेर
बन सकता है।

Tuesday, July 21, 2026

लोकतंत्र या लाठीतंत्र?

सर फोड़ती लाठिया ये साबित करती हैं। की सता में बैठा शासक कितना क्रूर और तानाशाह हैं।

वो सब मरे जाएंगे जो चुप है।

बेरोजगार, किसान, छात्र, यही लड़ सकते है। हर इंसान के हिस्से की अन्याय की लड़ाई। ये कामकाजी नौकरी पेशे लोग अन्याय के खिलाप कभी नहीं बोलेंगे। अंग्रेजी हुकूमत में भी जिनको काम मिल गया था। वो कभी नहीं बोले अंग्रेजों के खिलाफ। ७०% इंसान को अन्याय तभी दिखता है। जब तक उसके साथ नहीं होता। ३०% लोग क्रांतिकारी होते है। उन्हें अपना पराया नहीं बस अन्याय दिखता है। वो हर अनन्य की चिंगारी पे आवाज बुलन्द करते हैं। ये ३०% लोग सदियों से सदियों तक पैदा होते रहेंगे, और सदियों तक याद किए जाएंगे। हर हिस्से की लड़ाई लड़ने के लिए। 
Democracy cannot function under dictatorship,  

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