Friday, September 11, 2020

कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हू…

हर दिन अपने लिए एक जाल बुनता हूँ, 
कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ| 
हर रोज़ इम्तिहान लेती है जिंदिगी, 
हर रोज़ मगर मैं मोहब्बत चुनता हूँ| 
कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हू…
 बहुत दूर चला आया हूँ कारवाँ से, तन्हा रास्तों में एक हमसफ़र ढूंढता हूँ| 
कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ…
 अंधेरों में तुम्हारा चेहरा साफ़ दिखता है, 
तुम सामने होते हो जब आँख मूंदता हूँ| 
कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ…
 सिर्फ एहसास ए मोहब्बत बन जाता हूँ, 
जब तेरी जबीं को मैं चूमता हूँ| 
कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ…
 तेरे होते हुए सुखन मुमकिन नहीं, तेरे जाते ही अपनी कलम ढूंढता हूँ| 
कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ…
 सब हैरान हैं देख कर रक्स ए इश्क, मैं तेरी वफ़ा में ऐसा झूमता हूँ|
 कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ…
 दिल में आशियाने की आरजू लिए, मैं शहरों शहरों घूमता हूँ| 
कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ…
लोग सुनाते हैं और मैं सुनता हु, बस कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ…

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